Saturday, January 24, 2015

हम हैं रणबांकुरे: अब कुछ कर दिखाना (Only you can transform: move now)


courtesy: dreamstime.com

(आज की पोस्ट- 16 मई 2014 को लिखे मेरा एक लेख से प्रेरित एवं उस से कुछ अंश लिए हुये है।)       

जीवन अत्यंत ही सरल एवं शांत बीत जाता है जबतक कि हम उसे आंदोलित कर स्वयं महानता कि सीढ़ी चढ़ा नहीं देते। आज भी जीवन एवं दिनचर्या की एकाँकी (one act play जैसी  ) सरलता से भरी चाय पीते पीते अपने दफ्तर मे समय व्यतीत हो रहा था कि Internet  पर भारत के 2014 के Lok Sabha elections  के नतीजे देखे। लगा मानो देश मे छ: दशक बाद एक बार फिर आज़ादी आई है। एक लहर जो क्रांति बन जन आंदोलन का स्वरूप ले जनमत के रूप मे प्रस्तुत हुयी है। थोड़ी देर तो उत्साह और प्रसन्नता से मन भरा रहा परंतु जल्दी ही अपने सरल जीवन मे व्यस्त हो गया । शांति भंग करने का मौका प्रकृति सबको देती है, मुझे भी थोड़ी ही देर मे newspaper मे श्री जयप्रकाश चौकसे के लिखे एक लेख से मिला - "महाभारत का एक और आकलन", लगा की आज का दिन वाकई मे खास है, सोचने समझने का दिन। लेख तो बहुत ही अलग और महाभारत के   पश्चात क्या हुआ होगा इसकी अवधारणा पर था। परंतु मै  एक अलग ही गहरी सोच मे डूब चुका था ।  सोच मे आते जाते विचारों से प्रश्नों एवं उत्तरों का अंबार लग गया...

भारत देश मे ना तो ज्ञान का आभाव है और ना ही प्रतिभा एवं ज्ञान उपासको का फिर भी देश मे व्यवहार कुशल , सातत्यता (continuity) से भरी उन्नतिशील विचारधारा , धर्म, कृत्य एवं पूर्ण परिष्कृत सोच (actions filled with improved thoughts) की सदा ही कमी महसूस होती रही है। नवीन विचार आते तो हैं परंतु पुराने विचारों का अवास्तविक , अववहारिक एवं रूढ़िवादिता का भार, (orthodoxical) एवं हल्के नवीन विचार (themes) उन्हे एक ही धारा मे बहा ले जाते है। ऐसी धारा जिसमे कोई तेज नहीं कोई वेग नहीं ताकत नहीं। खैर प्रयत्न होते रहते हैं परंतु कामयाबी सिर्फ सदियों या दशकों मे कुछ एक को ही मिलती है जो एक साथ सभी का मानस एवं हृदय परिवर्तन कर युग की धारा को मोड़ पाते हैं । पर उसमे भी एक तकलीफ,  भारत मे ये लोग या तो भगवान बन अवतार का दर्जा पा लेते हैं , कुछ युग पुरुष या नहीं तो नेता ही बन परमार्थ की चाबी से नए पुराने तालों की राजनीति से जनता को नयी दिशाओं मे चलने के लिए छोड़ जाते हैं। "अरे! पर इसमे गलत क्या है? ये तो  हर जगह होता"।  गलत तो नहीं पर अजीब ज़रूर है। दुविधाओं और विडंबनाओं (dilemma) से भरा जीवन ही हो कर रह जाता। "कैसे?"  

बेचारी जनता, "जैसा की सुबह  से मेरे साथ हो रहा", नए विचारों , ऋचाओं, उपासनाओं, कर्मकांडओ, धर्म एवं कर्म-अकर्म (confused dos and donts) नैतिकता मे फंसी सोच एवं विचार के अंधे कूए मे जो भी सहूलियत की पहली रस्सी मिलती देखती उसी को पकड़  बाहर आकार राहत की सांस ले आज़ादी का भ्रम पाल खुश हो जाती है । भारत की विडम्बना ही है कि दुनिया के लिए प्रमुख ज्ञान  का स्त्रोत  बन कर भी   स्वयं प्रत्येक शताब्दी के अंतराल पर आज़ादी के लिए प्रयास करता नज़र आता है। ऐसा क्या होता है कि ज्ञान, विचार, शिक्षा हमेशा ही अपर्याप्त हो जाती है? ऐसा कौन सा जहर है जो प्रत्येक उपयोगी विचार को दूषित कर देता है? Dilution का ऐसा भयंकर उदाहरण संसार मे सिर्फ यहीं देखने को मिलता। हम बहुत  प्रसन्न  होते हैं, इसे अपनी ताकत समझते हैं,  परंतु ये तो चिंता का विषय है कि हमारी सभ्यता अन्य सभी आने वालों को को अपने अनुरूप कर लेती है, ऐसी कैसी विचार धारा है जो प्रत्येक नवीन सत्य को बुलबुले की तरह फोड कर स्वयं की अहं की वायु मे मिला लेती है? हाँ पर जो भी चमकीला और बुरा आता है उसको तो बहुत  प्रीति दिखा कर अपना लेती और विशाल हृदये का परिचय  देती! "मेरा मन तो स्वीकार नहीं कर रहा और कुछ पूछ रहा "।

क्या हमारी सोच, हमारी सत्ता, हमारी शैली, सर्वश्रेष्ट, सर्वजनहिताए, सर्वजनप्रिय (all conducive) है? क्या इसे युग युगांतरों तक सुख के साथ चलाये जाने वाला कहा जा सकता? या फिर यह एक Blackhole  की तरह जिद्दी एवं सभी को अपने जैसा बनाने वाली प्रवृत्ति से भरी एक तड़पती हुयी भव्य चेतना है जो स्वयं को जीवित रखने के लिए अन्य सभी नवीन सृष्टियों को चुनौती दे अपने अंधकार को प्रकाश की तरह प्रसारित करती रहती है। यह अंधकार तो मुझे बाइबल और Milton के कहे नर्क (Hell) मे जलती आग की तरह लगती जहां आग ही आग होने के बावजूद गहरा अंधेरा है। इतिहासकर , cultural experts, कई मतों से भारतीय संस्कृति पर पड़े प्रभाव को justify  करते हैं परंतु यहाँ आज मुद्दा ये है की स्वयं को सर्वश्रेष्ठ समझने  एवं समझाने वाली भारतीय संस्कृति एवं विचार हमारे हाथों मे अब कितनी मददगार है ? आज भी अनंत काल से राम राज्य की कल्पना ही की जाती रही है , कब स्थापित हुआ है राम राज्य? चंद्रगुप्ता, मौर्य, शक, हूण, वोडियार, शिवाजी, किस ने करा है संघर्ष विहीन सांस्कृतिक एवं आंदोलन रहित जीवन, आदर्श,धर्म एवं कर्म का प्रतिपादन (establishment). शायद किसी ने नहीं, ये सभी उसी Blackhole मे समाहित हो गए। 

ये प्रश्न भले ही मेरे subconscious मे पड़े रहे परंतु मुझे मुझ मे कुछ तो अलग उस दिन आवाज़ दे रहा था, आज मे जीने का गौतम बुद्ध का संदेश मुझे बहुत प्रासंगिक लग रहा था। शायद मेरी आवाज़ का कोई विशेष महत्व न हो पर मुझ मे एक अलग ही चमक और चेतना का सूत्रपात (evolution) हो रहा था जिसे मैंने साहस कर होने दिया। Blackhole मुझे भी खींच रहा था पर बुद्ध की वाणी ने मुझे अपनी एक आकाशगंगा (galaxy) बनाने की प्रेरणा दी। भारत मे आज भी कई जुगनू और तारे  प्रकाशित हो रहे पर उनको मिलकर एक solar system बनना है । एक सूत्र मे बंधकर एक विचार पर काम करना आवश्यक है। शायद मेरी महत्वाकांक्षा बहुत  बड़ी है, पर इसे पूरे करने वाले लोग भी कुछ छोटे नहीं है। परेशानी ये है की प्रत्येक ज्ञान दीपक के आस पास मतभेद, स्वार्थ और सबसे बड़ा उस Blackhole से सदा रिसने वाली dilution की भारतीय हवा ने सबको इतना कमजोर कर दिया है कि परिवर्तन और साहस अब हमे movies मे ही अच्छे लगते।  हम एक कष्टमयी, अकर्मण्य, पलयंकारी (escapist) का जीवन जीने के आदि हो गए हैं।

तो ऐसा क्या है जो अब किया जान चाहिए? इस प्रश्न  ने मेरे अंदर एक संभावना को जन्म दिया। अपने साथ मैंने और लोगों को जगाने का बीड़ा उठाया। Self Reflection एवं चिंतन और आपसी सहयोग से देशवासियों को वैचारिक आज़ादी पा सकने का विचार आया। आज का दिन हो सकता है मेरी स्वयं पर विजय का दिन था पर यहाँ खतम नहीं होता ये तो शुरुवात थी ,  और दूसरों को भी जीत के लिए प्रेरित करना होगा। हो सकता है मै कोई दीपक न जला सकूँ पर स्वयं प्रकाश तो  फैला ही सकता। और प्रकाश होता देख शायद  लोग शायद स्वयं ही नींद से जाग जाएँ। एक ऐसी सामाजिक संरचना के लिए जो individual के प्रयास से  शुरू होती है। अब बस देखना ये है की ये कितनी शीघ्रता से होता है ।

( इति शुभम)

इस लेख को 16 मई को लिखने के बाद मुझे स्वयं के लिए एक नया रास्ता मिला । राजनीतिक तौर पर change दिखे या न दिखे व्यक्तिगत तौर पर मैंने initiative लेना शुरू कर दिया था और उसी संदर्भ (context)  मे आगे कदम बढ़ाते हुये अपने अन्य प्रयासों के साथ अपने लेखन को मैंने एक नयी दिशा दे personal के साथ  social करते हुये इस blog की शुरुवात की। मेरे लेख मुझे तो प्रेरणा देते ही हैं पर मुझे विश्वास है ये दूसरों को भी लक्ष्य निर्धारण मे मदद करेंगे।   लिखते लिखते अब  फिर कुछ आवाज़ें आ रही :

 देखो कैसे हम शिथिल पड़े 
भाग्यवाद पे जमे खड़े

अपने स्वर्णिम  होने की गरिमा मे हमने कितनी होली खेली
पर दीवाली आ न पायी, हमने एक खिड़की भी न खोली

कितने आए और चौराहों पर खड़े हुये
पर हम आज भी मूर्ति बनाने  मे लगे हुये

 अब समय  आ गया कि  सुनो  दिल की आवाज़ 
इसी  क्षण करो परिवर्तन का आगाज

क्योंकि, सारे जहाँ से अच्छा है इंडिया हमारा
हम हैं रणबांकुरे इसके, अब कुछ कर दिखाना



भगवान कार्तिकेय हम सब मे रणबांकुरा पैदा करें।

इसी शुभकामना के साथ

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